Friday, May 7, 2010

ताज़िराते हिंद... दफ़ा ३०२ के तहत...

२६/११ के हमले का मुख्य आरोपी अज़मल आमीर क़साब को कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई। इस आतंकवादी का आतंक डेढ़ साल पहले पूरे विश्व ने लाईव देखा था। फिर भी उसे सिर्फ़ सज़ा सुनाने मे भारतीय न्यायव्यवस्था को डेढ़ साल से भी ज़्यादा वक्त लगा। जब क़साब को सज़ा सुनाई गयी, तब मुंबई और भारत मे कई जगह बड़ी धूम-धाम से खुशियां मनाई गयी। कुछ लोगो ने मिठाईयां बांटी, कई ने पटाकें जला के अपनी खुशियां ज़ाहिर की। जिस पाकिस्तानी आतंकवादी का आतंक पूरे विश्व ने देखा था, उसे फांसी की सज़ा की अपेक्षित थी। क़साब को फ़ाईव स्टार होटल के माहोल मे रखने के बाद फांसी की सज़ा सुनाई गयी, इस मे इतनी खुशियां मनाने की ज़रूरत नहीं थी। गांधी के इस देश मे किसी को फांसी की सज़ा सुनाने के बाद इतनी खुशियां मनाते मैंने पहली बार देखा है।

अब फांसी तो सुनाई, मगर उस का अमल करना हमारे देश के लिए तकरिबन नामुमकिन काम बन गया है। अपनी न्यायप्रक्रिया से भारत के सभी नागरिक वाक़िफ़ है। इस के बाद क़साब के सामने हाय कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट का रास्ता खुला है। अगर उसने यहां अपील की तो और भी वक्त ज़ाया हो सकता है। और सबसे बड़ी बात यह तो है के सन २००४ से इस देश मे कोई फांसी नहीं दी गयी। फांसी से बचने का एक बडा़ मार्ग हमारी राज्यघटना ने हमे दिया है। वो है, राष्ट्रपति से अपील। जिन जिन लोगों को पिछले सात सालों मे फांसी की सज़ा सुनाई गयी है, उन सब ने राष्ट्रपति से सज़ा कम करने के लिए अपील की है। यह आंकडा ३० से भी अधिक है। इस में अपनी संसद पर हमला करने वाला आतंकवादी अफ़ज़ल गुरू भी शामिल है। केंद्र सरकार इस आतंकवादी की फांसी को अब तक टालते आई है। इस के पीछे क्या कारण है, यह आम जनता तो नहीं जानती। कुछ साल बाद इस कतार मे अज़मल आमीर क़साब का नाम भी शामिल हो जायेगा। तब तक कई साल गुज़र गये होंगे। अपने राष्ट्रपति अपने काम बहुत ज़्यादा बिज़ी होने के कारण उन्हे फांसी की याचनाओं को देखने के लिए बिलकुल वक्त नहीं मिल रहा। अगर अगले २० साल तक किसी भी राष्ट्रपति को वक्त नहीं मिला तो यह देश फांसी से मुक्तता पा सकता है। और गुरू तथा क़साब जैसे आतंकी खुले आम देश की जनता का क़त्ल करते घूमेंगे। क्योंकी उन्हे कभी भी अपनी मौत का भय नही होगा। पिछले कई आतंकी घटनाओं से अब हम सब जान चुके है की, आतंकवादियों को हमारी न्यायव्यवस्था कुछ भी नहीं कर सकती...!
क़साब को फांसी की सज़ा सिर्फ़ ’सुनाकर’ हमने कोई बड़ा तीर नहीं मारा है। इससे आतंकियों को कुछ सबक़ नहीं मिला है। अगर अगले पूरे सालभर मे उन्होने क़साब को फांसी पर चढाया तोही समझ मे आयेगा की हमारी न्यायव्यवस्था मे कुछ तो दम है। नहीं तो पाकिस्तानी आतंकी और जोरशोर से भारत पर हमले की तैयारी करने लगेंगे।

1 comment:

  1. ..AND HENCE ARE THE DRAWBACKS OF INDIAN DEMOCRACY..IN AMERICA KASAB WOULD HAVE BEEN KILLED IN 1 MONTH..WE ARE ADAMANT TO CHANGE OUR SYSTEM..AND HENCE INDIA NEEDS A HITLER...WHO CAN CHANGE INDIA IN JUST FEW YEARS. NICE BLOG SIR..

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